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Wednesday, July 1, 2026


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द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वर्ष 1942 में हाथीबड़कला में स्थानांतरित कर दिया गया भारतीय सर्वेक्षण विभाग

देहरादून। भारतीय सर्वेक्षण विभाग, भारत की नक्शे बनाने और सर्वेक्षण करने वाली केन्द्रीय एजेंसी है। इसका गठन 1767 में ब्रिटिश इंडिया कम्पनी के क्षेत्रों को संगठित करने हेतु किया गया था। यह भारत सरकार के पुरातनतम अभियांत्रिक विभागों में से एक है। सर्वेक्षण विभाग की अद्भुत इतिहास रचना में व्याल/मैमथ महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण भी आते हैं। भारतीय सर्वेक्षण विभाग भारत का सबसे प्राचीन वैज्ञानिक विभाग है। वर्ष 1767 में स्थापित यह संस्था देश की राष्ट्रीय मानचित्रण और सर्वेक्षण एजेंसी है, जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन कार्य करती है। विभाग की जड़ें 1757 में प्लासी की लड़ाई के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा जीते गए क्षेत्रों के राजस्व संग्रह और भौगोलिक ज्ञान की आवश्यकता से जुड़ी हैं। 1767 में बंगाल के भू-कर और अन्य सर्वेक्षणों के लिए ‘सर्वे ऑफ बंगाल’ के रूप में इसकी स्थापना की गई। मेजर जेम्स रेनेल को बंगाल का प्रथम सर्वेयर जनरल नियुक्त किया गया था। 10 अप्रैल 1802 को मद्रास (अब चेन्नई) के पास कर्नल विलियम लैंबटन द्वारा ‘महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण’ शुरू किया गया। यह पृथ्वी की सतह का अब तक का सबसे लंबा और सटीक माप प्रोजेक्ट था। 1815 में सभी क्षेत्रीय सर्वेक्षणों को मिलाकर ‘भारतीय सर्वेक्षण विभाग’ का रूप दिया गया और कर्नल कोलिन मैकेंजी को भारत का पहला महासर्वेक्षक बनाया गया। उनके उत्तराधिकारी, कर्नल जॉर्ज एवरेस्ट के नेतृत्व में इस प्रोजेक्ट ने अभूतपूर्व ऊंचाइयों को छुआ। उन्हीं के नाम पर दुनिया की सबसे ऊंची चोटी का नाम ‘माउंट एवरेस्ट’ रखा गया। 1852 में विभाग के भारतीय गणितज्ञ राधाननाथ सिकदर द्वारा हिमालय की ‘पीक एक्सवी ‘ की ऊंचाई 29,002 फीट (वर्तमान में 29,037 फीट या 8,848 मीटर) मापी गई जिसे बाद में माउंट एवरेस्ट का नाम दिया गया। 1942 में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान इसके कार्यालयों को देहरादून स्थानांतरित कर दिया गया। आजादी के बाद, विभाग ने भाखड़ा बांध, भिलाई स्टील प्लांट और नागार्जुन सागर जैसी विशाल परियोजनाओं के लिए सटीक निर्देशांक और मानचित्र प्रदान करके राष्ट्र निर्माण में अहम भूमिका निभाई।

देहरादून का असली वैज्ञानिक इतिहास एक बेहद खूबसूरत और स्वाभाविक क्रम में आगे बढ़ा है। जब हम दून घाटी के जल, जंगल और जमीन के अनुसंधान को टटोलते हैं, तो उसकी पहली और सबसे मजबूत कड़ी वर्ष 1767 में स्थापित हुआ भारतीय सर्वेक्षण विभाग है। यह न केवल देहरादून बल्कि पूरे भारतवर्ष का सबसे पुराना वैज्ञानिक विभाग है। ब्रिटिश काल में जब देश के नक्शे बनाने, सीमाओं को तय करने और पहाड़ों की ऊँचाई नापने की बात आई, तो इस महान संस्थान का मुख्यालय द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वर्ष 1942 में हमेशा के लिए देहरादून के हाथीबड़कला में स्थानांतरित कर दिया गया। इसी संस्थान ने सबसे पहले हिमालय की भौगोलिक संरचना, यहाँ की नदियों के उद्गम और जंगलों की सीमाओं को रेखांकित किया। इसी संस्थान के मानचित्रों और आंकड़ों के आधार पर आगे चलकर देश के अन्य बड़े विभागों की नींव पड़ी।

भारतीय सर्वेक्षण विभाग की इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से आगे चलकर देश के कई महत्वपूर्ण केंद्रीय प्रभागों और संस्थानों को दिशा मिली। उदाहरण के लिए, देश के खनिजों और जमीन के भीतर छिपी संपदा को खोजने के लिए वर्ष 1851 में जिस भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण का गठन हुआ, उसके शुरुआती मानचित्रण का आधार भी इसी संस्थान के नक्शे ही थे। इसी तरह, वर्ष 1965 में जंगलों की लकड़ी और प्राकृतिक संसाधनों के हवाई सर्वेक्षण के लिए शुरू की गई एक विशेष परियोजना को इसी विभाग के सहयोग से चलाया गया, जो आगे चलकर वर्ष 1981 में पूरी तरह एक स्वतंत्र केंद्रीय संगठन बना, जिसे आज हम भारतीय वन सर्वेक्षण के नाम से जानते हैं। यही नहीं, जब वर्ष 1976 में विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय का प्रतिष्ठित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान दिल्ली विश्वविद्यालय से देहरादून आया, तो उसके पास अपनी कोई जमीन नहीं थी। तब इसी भारतीय सर्वेक्षण विभाग ने अपने हाथीबड़कला परिसर के भीतर वाडिया के वैज्ञानिकों को जगह दी, जहाँ रहकर उन्होंने देश के नक्शों की मदद से हिमालय की परतों और भूगर्भीय हलचलों पर अपना पहला बुनियादी शोध शुरू किया, जो आज जनरल महादेव सिंह मार्ग पर स्वतंत्र रूप से फल-फूल रहा है।

इसी विशाल इतिहास की उंगली पकड़कर जब हम कौलागढ़ मार्ग की तरफ बढ़ते हैं, तो वहाँ केवल तीन सौ मीटर के एक सीधे और विशिष्ट दायरे में भारत के सबसे मान्यता प्राप्त स्वायत्त केंद्रीय संस्थानों का एक ऐसा व्यवस्थित समूह दिखाई देता है, जो पूरी दुनिया में बेमिसाल है। इस कौलागढ़ रोड की शुरुआत वन अनुसंधान संस्थान के विशाल स्वतंत्र परिसर से होती है, जो वर्ष 1906 से देश में वानिकी अनुसंधान का सबसे बड़ा केंद्र है। सीधे केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के तहत आने वाले इस परिसर के भीतर स्कूल, कॉलेज और एक मानद विश्वविद्यालय का पूरा शैक्षणिक ढांचा काम करता है। इसके आंतरिक ढांचे में करीब अट्ठाईस से बत्तीस वैज्ञानिक प्रभाग सक्रिय हैं, जो पेड़ों की छालों, पत्तों, जड़ों और गैर-लकड़ी वन उत्पादों पर रात-दिन शोध करते हैं। इसी परिसर के भीतर देश के वनों की नीतियां तय करने वाली सर्वोच्च परिषद और भारतीय वन सेवा के अधिकारियों को प्रशिक्षित करने वाली इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी भी स्थित है। दिलचस्प बात यह है कि वर्ष 1982 से 1984 के आसपास चंद्रबनी में स्थापित हुआ भारतीय वन्यजीव संस्थान भी शुरुआती दौर में इसी वन अनुसंधान संस्थान की एक शाखा के रूप में काम करता था, जो आज स्वतंत्र रूप से देश के वन्यजीवों और बाघों की गणना का जिम्मा संभालता है।

इसी तीन सौ मीटर के दायरे में जब हम आगे बढ़ते हैं, तो कौलागढ़ मार्ग पर ही एक अलग स्वतंत्र परिसर आता है, जहाँ भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के उत्तरी क्षेत्रीय केंद्र संयुक्त रूप से काम करते हैं। इस परिसर के भीतर छह ऐसे अति-विशिष्ट और वैज्ञानिक विंग संचालित हैं जो आम जनता की नजरों से दूर रहकर काम करते हैं। इनमें पादप वर्गीकरण, ऐतिहासिक जड़ी-बूटियों का डिजिटल संवर्धन, नदियों और आर्द्रभूमियों का जलीय अध्ययन, कीट विज्ञान, जलीय पक्षियों के सिमटते आवास और वनों की मिट्टी की उर्वरता तय करने वाले प्रभाग शामिल हैं।

इस संस्थान से कुछ ही कदम आगे चलने पर भारतीय वन सर्वेक्षण का अपना स्वतंत्र डिजिटल परिसर आता है, जो उपग्रहों के जरिए पूरे देश के जंगलों की लाइव सेहत पर नज़र रखता है। ठीक इसके सामने, सड़क के दूसरी तरफ कृषि मंत्रालय के अधीन आने वाला भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान का अलग परिसर मौजूद है, जो पहाड़ों में मिट्टी के कटाव को रोकने और वर्षा जल के संचयन की तकनीकों पर ऐतिहासिक शोध करता है। इस वैज्ञानिक कतार को संपूर्णता देने के लिए इसी मार्ग पर तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम का के.डी. मालवीय पेट्रोलियम अन्वेषण संस्थान और भू-डेटा प्रसंस्करण केंद्र स्थित हैं। भले ही यह ऊर्जा विभाग है, लेकिन इसके सुपरकंप्यूटर और भू-वैज्ञानिक जमीन के भीतर करोड़ों साल पुरानी चट्टानी परतों और पानी के विशाल भूमिगत भंडारों का मानचित्रण करते हैं, जिन्होंने प्राचीन सरस्वती नदी के जलमार्गों को खोजने में मुख्य भूमिका निभाई थी। कालिदास रोड पर स्थित भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान अंतरिक्ष विज्ञान के जरिए इन सभी विधाओं को आपस में जोड़ता है। देहरादून का यह संपूर्ण वैज्ञानिक सफर हाथीबड़कला स्थित भारतीय सर्वेक्षण विभाग से शुरू होकर आज कौलागढ़ मार्ग के इस तीन सौ मीटर के बेहद खास दायरे, चंद्रबनी के विशाल और सघन वानिकी भूभाग, जो क्लेमेंट टाउन से सटा हुआ है, चकराता रोड, जनरल महादेव सिंह मार्ग, करनपुर, कालिदास मार्ग और शहर के अन्य महत्वपूर्ण हिस्सों तक दूर-दूर तक फैला हुआ है। जल, जंगल, जमीन और पर्यावरण के संरक्षण का यह अनूठा और विश्वस्तरीय साम्राज्य हमारी दून घाटी की असली पहचान है।

 

 

 

 

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