देहरादून। गुलाम गौस ख़ान झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के सबसे करीबी और भरोसेमंद साथियों में से एक थे। वह रानी की सेना के मुख्य तोपची थे और अपनी सटीक निशानेबाज़ी के लिए मशहूर थे। जब 1857 में अंग्रेज़ों ने झाँसी के किले पर हमला किया, तब गुलाम गौस ख़ान ने अपनी तोपों ‘कड़क बिजली’ और ‘भवानी शंकर’ से अंग्रेज़ी सेना के छक्के छुड़ा दिए थे। रानी उन पर इतना भरोसा करती थीं कि किले की सुरक्षा की बड़ी ज़िम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर थी।
3 अप्रैल 1858 का दिन झाँसी के इतिहास में बहुत भावुक था। अंग्रेज़ों के साथ ज़बरदस्त जंग के दौरान गुलाम गौस ख़ान अपनी तोप चलाते हुए शहीद हो गए। उन्होंने धोखेबाज़ों और दुश्मनों के सामने झुकने के बजाय अपने वतन और अपनी रानी के लिए जान कुर्बान करना बेहतर समझा। उनकी बहादुरी को याद रखने के लिए झाँसी में एक पार्क का नाम उनके नाम पर रखा गया है, जो आज भी हमें इस महान देशभक्त की वफ़ादारी और साहस की याद दिलाता है।




