36.7 C
Dehradun
Sunday, June 14, 2026


spot_img

जनता पूछे, अच्छे दिन कब आएंगे? : सीपीआई (एम)

देहरादून।  2014 में देश को “अच्छे दिन” दिखाए गए थे। चुनावी हवाओं में उड़ता हुआ एक सपना–विकास, रोज़गार, सस्ती महंगाई, और एक ऐसा भारत जो दुनिया के सामने सिर उठाकर खड़ा हो। उस सपने के नाम पर जनता ने वोट दिए, उम्मीदें लगाईं, और सरकार को मौका दिया। तेरह साल बाद, 2026 में, वही सरकार जनता के सामने एक बिल्कुल अलग एजेंडा लेकर आई है। “कम खर्च करो, कम घूमो, कम खाओ।” यानी वही जनता जिससे वादा किया गया था – “हम तुम्हारा बोझ हल्का करेंगे” – अब उसी जनता से कहा जा रहा है – “तुम ही बोझ उठाओ, और कुछ त्याग करो।”

सरकारी तंत्र और उसके समर्थक आज चार साफ़ संदेश दे रहे हैं – सोना मत खरीदो, विदेश मत जाओ, पेट्रोल कम जलाओ, तेल कम खाओ। हर संदेश के पीछे कोई न कोई बहाना ज़रूर होता है – आयात घटाना है, विदेशी मुद्रा बचानी है, प्रदूषण कम करना है, सेहत सुधारनी है। लेकिन असली वजह कुछ और ही दिखती है – सरकार के खजाने में छेद हैं, अर्थव्यवस्था ठीक से नहीं चल रही, और महँगाई का बोझ बढ़ता जा रहा है। और इसी बीच, सीमा पार, चीन चुपचाप अपनी अर्थव्यवस्था को मज़बूत कर रहा है। वहाँ डॉलर का भंडार बढ़ रहा है, व्यापार अधिशेष नया रिकॉर्ड बना रहा है, और युआन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनने की राह पर है। चीन आज न केवल विश्व की फैक्ट्री है, बल्कि तकनीकी विनिर्माण में भारत से कई कदम आगे है। जब भारत अपनी जनता से कह रहा है – “विदेश मत जाओ, तेल कम खाओ” – तो चीन अपने नागरिकों को प्रोत्साहित कर रहा है कि वे दुनिया में जाएँ, निवेश करें, और अपनी मुद्रा का विस्तार करें। यह अंतर महज़ रणनीति का नहीं, बल्कि सोच और दृष्टि का है। भारत की अर्थव्यवस्था का हाल तो यह है कि विदेशी मुद्रा भंडार घट रहा है, रुपया लगातार कमज़ोर हो रहा है, निर्यात ठप है, और विदेशी निवेशक झुलस कर बाहर निकल रहे हैं। सरकार के पास इस सबका इलाज कोई नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि जनता का त्याग बनकर सामने आता है। जब अर्थशास्त्र हार जाए, तो संयम का उपदेश हाथ में लिया जाता है। और यहीं सबसे बड़ा प्रश्न उठता है–यह त्याग सिर्फ जनता से ही क्यों? आँकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं। संसद में पेश किए गए आँकड़ों के अनुसार, 2014 से 2018 के बीच अकेले प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं, चार्टर्ड विमानों और विमान रखरखाव पर दो हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च हुए। 2022 से 2024 के बीच मात्र 38 विदेश दौरों पर ढाई सौ करोड़ रुपये उड़े। 2025 की कुछ चुनिंदा यात्राओं ने साठ करोड़ रुपये का और बोझ डाला। यानी जनता टैक्स भरती रही–और विश्वगुरु का वर्ल्ड टूर चलता रहा। अब बात करते हैं हाल के चुनावों की। उसी सरकार और उसकी पार्टी ने जब चुनावी मैदान में कदम रखा, तो जनता को मितव्ययिता का पाठ पढ़ाने वालों ने हर राज्य में अनाप-शनाप धन बहाया। एक चुनावी रैली के मंच पर ही बीस करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए। स्टार प्रचारकों के हेलीकॉप्टरों ने इतना ईंधन जलाया कि पूरा गाँव महीनों बिजली खरीद सकता था। सोशल मीडिया पर बूस्टिंग, होर्डिंग्स पर मुस्कुराते चेहरे, प्रचार सामग्री के रैपरों से ढक गए शहर – और यह सब उसी पार्टी ने किया जो आज जनता से कह रही है–“कम खर्च करो।” एक अकेले चुनावी राज्य में पार्टी द्वारा घोषित “वादे पत्र” छपवाने पर ही करीब पचास करोड़ रुपये खर्च हुए–जो किसानों की एक फसल के बीमा प्रीमियम के बराबर है। पीएम की रैलियों में लग्जरी टेंट, एलईडी दीवारें, इतने ड्रोन कैमरे कि पूरे जिले की पुलिस को लगाना पड़ा। और वही नेता जो मंच से “अपव्यय रोकने” का जिक्र करते हैं, वही नेता विदेश दौरे पर पाँच सितारा होटलों में ठहरता है, चार्टर्ड जेट बदलता है, और एक शाम के डिनर पर भारत के एक सरकारी स्कूल का साल भर का बजट खर्च कर देता है। यह कोई सरकार नहीं, यह कोई हॉस्टल का वार्डन है जो हर बच्चे को उसके खर्चे पर फटकार लगाता है। लोकतंत्र में सरकार का काम है–सुशासन देना, रोज़गार पैदा करना, अर्थव्यवस्था को मज़बूत करना। यह काम नहीं है कि वह जनता को उपदेश दे कि क्या खाए, क्या पहने, कहाँ जाए। खुद नेता हज़ारों करोड़ की शाही गाड़ियों में सफर करें, लाखों के चश्मे लगाएँ, दस करोड़ के सूट पहनें, विदेशों में भव्य रोड शो करें, कैमरों के सामने मुस्कुराएँ – और आम आदमी अपनी बेटी की शादी में दो चूड़ी खरीद ले, तो अर्थव्यवस्था खतरे में आ जाती है? हम बारह साल से यही देख रहे हैं। बेरोज़गारी कम हुई क्या? युवा अब भी सरकारी नौकरी के लिए रोज़ी रोटी छोड़े बैठे हैं। पेट्रोल सस्ता हुआ क्या? अंतरराष्ट्रीय कीमतें गिरीं, तो टैक्स बढ़ा दिया गया। रुपया मज़बूत हुआ क्या? डॉलर के सामने लगातार कमज़ोर पड़ रहा है – जबकि चीन का युआन स्थिर है और उसके भंडार अभूतपूर्व स्तर पर हैं। किसान की आय दोगुनी हुई क्या? वह अब भी दिल्ली के बॉर्डर पर ठिठुरता दिख जाता है। मध्यम वर्ग को टैक्स से राहत मिली क्या? नाम की ही राहत है। चीन डर गया क्या? सीमा पर तनाव कम नहीं हुआ, व्यापार घाटा बढ़ता ही जा रहा है, और चीन ने दुनिया के सबसे तेज़ ट्रेन, स्पेस स्टेशन, सेमीकंडक्टर में छलाँग लगा दी है। हर असफलता पर जनता का ठीकरा फोड़ दिया जाता है। हर संकट का इलाज जनता का त्याग बताकर थमा दिया जाता है। लाल बहादुर शास्त्री जी ने “एक समय भोजन छोड़ो” का नारा दिया था। वह कोई साधारण वाक्य नहीं था। उस समय देश युद्ध और भीषण खाद्यान्न संकट से गुज़र रहा था। और शास्त्री जी ने वह नारा देने से पहले खुद सादगी अपनाई, खुद विलासिता त्यागी, खुद अपनी पत्नी से कहा – “मैं पहले एक समय भोजन छोड़ूंगा।” आज कौन सा युद्ध चल रहा है? कौन सा अकाल आ पड़ा है? फिर क्यों जनता से संयम और त्याग की उम्मीद की जा रही है? और सबसे बड़ी बात – जब नेता खुद शाही जीवन जी रहे हों, जब पार्टी चुनावों में रुपये की बरसात कर रही हो, जब प्रधानमंत्री की रैलियों का खर्च देश के शिक्षा बजट के एक जिले के बराबर हो, तो उनका जनता को “कम खाओ” का उपदेश देना कितना सार्थक है? देश भाषणों से नहीं चलता। न ट्वीट से, न रोड शो से, न विदेशों में थिरकने से। देश चलता है मेहनतकशों के पसीने से, रोज़गार से, मज़बूत अर्थव्यवस्था से, जवाबदेही से। चीन अपनी प्रगति दिखा रहा है–मेट्रो, हाई-स्पीड रेल, डॉलर के भंडार, और विनिर्माण का दबदबा। वहीं हम यहाँ जनता को “त्याग” का पाठ सुना रहे हैं। जब तक सरकार पहले खुद अपने शाही खर्चों पर कटौती नहीं करेगी–अपना आठ हज़ार करोड़ का विमान नहीं बेचेगी, बारह करोड़ की गाड़ी नहीं छोड़ेगी, दस करोड़ के सूट को अलमारी से बाहर नहीं फेंकेगी, चुनावी अपव्यय पर नकेल नहीं डालेगी, और पीएम केयर्स फंड में पड़े अरबों रुपये गरीबों पर नहीं लुटाएगी–तब तक उसका “कम खाओ, कम खर्च करो” जनता के लिए एक मज़ाक ही रहेगा। त्याग सुंदर है–जब वह स्वैच्छिक हो, निष्पक्ष हो, और पहले शीर्ष से शुरू हो। यह ठीक नहीं कि गरीब की रोटी पर कैंची चलाई जाए, जबकि शक्ति के गलियारों में विलासिता का दरिया बहता रहे। और यह ठीक नहीं कि चुनावों में करोड़ों उड़ाने वाली पार्टी जनता को मितव्ययिता सिखाए। तब तक जनता पूछती रहेगी – “अच्छे दिन कब आएंगे? और क्या वे उन्हीं के लिए हैं जो कहते हैं, या हम सबके लिए?” और सरकार को जवाब देना होगा। भाषणों से नहीं–कर्मों से।

लेखक – अनन्त आकाश सीपीआई (एम) देहरादून के सचिव हैं

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

spot_img
spot_img

Stay Connected

22,024FansLike
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe

Latest Articles

- Advertisement -spot_img