देहरादून। देहरादून स्थित लैंसडाउन चौक शहर के सबसे पुराने और व्यस्त चौराहों में से एक है। यह घंटाघर और पलटन बाज़ार के मुख्य मार्गों को आपस में जोड़ता है। इस चौक का नाम 19वीं सदी के ब्रिटिश भारत के वायसराय ‘लार्ड लैंसडाउन’ के नाम पर रखा गया था। लैंसडाउन चौक पर स्थित ब्रिटिशकालीन हरे-भरे बांस के झुरमुट को काटे जाने को लेकर बवाल मचा हुआ है। पर्यावरणविद से लेकर शहरवासी इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं। देहरादून के लैंसडाउन चौक पर स्थित ऐतिहासिक बांस का झुरमुट कटने से फिलहाल बच गया है। 1920 के दशक में अंग्रेजों द्वारा लगाए गए इस लगभग 100 साल पुराने झुरमुट को काटने की हाल ही में एक कोशिश की गई थी, जिसे पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय लोगों के विरोध के बाद रोक दिया गया। यह बांस का झुरमुट लगभग एक सदी पुराना माना जाता है, जो शहर के कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने और यात्रियों-विक्रेताओं को छाया प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वन विभाग मसूरी डीएफओ ने स्पष्ट किया कि इसे काटने की कोई अनुमति नहीं दी गई थी। यह झुरमुट सरकारी जमीन पर स्थित है, जिसके कारण अतिक्रमण की आशंका भी जताई जा रही है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस धरोहर को बचाने के लिए केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से इसे स्थायी रूप से संरक्षित करने की मांग की है। यह हरा-भरा स्थान अब दून की ऐतिहासिक धरोहरों का एक प्रमुख और जाना-पहचाना हिस्सा बन चुका है।
राजपुर रोड के याक पेट्रोल पम्प से थोड़ा आगे – हाथिबडकला, लैंसडाउन चौक पर भी बांस का रोपण ब्रिटिश काल में ही किया गया था। लेकिन सड़क चौड़ीकरण की ये भेट चढ़ गया।




