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Friday, June 26, 2026


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मसूरी की जल आपूर्ति का मुख्य आधार हमेशा से प्राकृतिक झरने और जलस्रोत रहे

देहरादून। मसूरी की जल आपूर्ति का मुख्य आधार हमेशा से यहाँ के प्राकृतिक झरने और जलस्रोत रहे हैं।  19वीं सदी की शुरुआत में अंग्रेजों द्वारा मसूरी बसाए जाने के शुरुआती दौर में भी पानी की उपलब्धता ही सबसे बड़ी प्राथमिकता थी। शहर के प्रमुख स्थानों, जैसे लैंडौर और कुलड़ी में, प्राकृतिक रूप से फूटने वाले झरनों के माध्यम से ही पानी की आपूर्ति की जाती थी। बढ़ती आबादी को देखते हुए ब्रिटिश काल (1906-1909) में मरे स्प्रिंग्स से पानी को 1,700 फीट ऊपर पंप करने के लिए भट्टा फॉल्स के पास जल-विद्युत परियोजना शुरू की गई। इसके बाद 1913 और 1925 में भिलारू जैसे अन्य प्राकृतिक जल स्रोतों का दोहन कर पानी की सप्लाई बढ़ाई गई। वर्तमान में 65% से अधिक पेयजल आपूर्ति (जैसे जिन्सी, भिलारू, कंडीघाट जैसे 9 प्रमुख स्रोत) इन्हीं प्राकृतिक झरनों से आती है। हालांकि, हाल के वर्षों में अनियोजित निर्माण और भारी पर्यटन के कारण जल संकट बढ़ा है, जिसके चलते सरकार और स्थानीय प्रशासन ‘धोबी घाट झील’ और यमुना नदी जैसी पंपिंग परियोजनाओं पर निर्भर होने लगे हैं। हिमालयी क्षेत्रों के जल संसाधन विशेषज्ञ भी मसूरी के प्राकृतिक झरनों और कैचमेंट क्षेत्रों के संरक्षण पर जोर देते हैं ताकि इस प्राचीन इकोसिस्टम को बचाया जा सके।

मसूरी में पानी की सप्लाई पुराने समय से ही प्राकृतिक झरनों और नदी-नालों पर निर्भर रही है। अंग्रेज जमाने में यहां लगभग 120 जल स्रोत थे, लेकिन अब सिमटकर केवल 20 मुख्य स्रोत ही बचे हैं। इन स्रोतों को पानी खींचने की तकनीक के हिसाब से पंपिंग और ग्रेविटी दो अलग-अलग व्यवस्थाओं में बांटा गया है। भिलाड़ू के अलावा यहां का सबसे बड़ा और मुख्य जरिया जिंसी पंपिंग योजना है, जिससे मध्य मसूरी और मुख्य शहर को हर रोज करीब 2.41 मिलियन लीटर पानी मिलता है। इसके बाद मरे योजना का नंबर आता है, जो खनाल्टी और बंसी जैसे छोटे स्रोतों को मिलाकर लंडौर और कैंटोनमेंट के इलाकों में लगभग 2.30 मिलियन लीटर पानी पहुंचाती है। बाकी बचे हिस्सों और होटलों की ज़रूरत को कोल्टी, मैकिनन और धोबीघाट जैसे छोटे झरने मिलकर पूरा करते हैं, जबकि स्थानीय बस्तियों को कंपनी खुद और नालापानी जैसे कुछ ग्रेविटी स्रोतों से सीधे पानी मिल जाता है। आज के समय में इन सभी पारंपरिक स्रोतों की हालत काफी चिंताजनक है। कंक्रीट के बढ़ते निर्माण और कम बर्फबारी की वजह से बारिश का पानी जमीन के भीतर नहीं जा पा रहा है, जिससे इन झरनों का जल स्तर 20 से 35 प्रतिशत तक घट गया है। आम दिनों में तो इनसे करीब 8-9 मिलियन लीटर पानी मिल जाता है, लेकिन गर्मियों के सीजन में पर्यटकों के आने से जब मांग बढ़कर 14.5 मिलियन लीटर पहुंचती है, तो इन पर भारी दबाव पड़ता है। साथ ही धोबीघाट जैसे कुछ स्रोतों के पास आबादी बढ़ने से उनमें सीवर और प्रदूषण मिलने का खतरा भी पैदा हो गया है, जिसे रोकने के लिए जल संस्थान अब नई पाइपलाइनें बिछा रहा है। इन प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भरता कम करने के लिए ही सरकार ने लगभग 144 करोड़ रुपये की लागत से यमुना-मसूरी पेयजल योजना शुरू की है। इस योजना के जरिए यमुना नदी से पानी लिफ्ट करके सीजन के दौरान मसूरी को हर रोज 7 से 8 मिलियन लीटर अतिरिक्त पानी दिया जा रहा है। हालांकि, तकनीकी दिक्कतों, बिजली कटने या गर्मियों में यमुना का अपना पानी कम होने की स्थिति में आज भी मसूरी को जिंसी, भिलाड़ू और मरे जैसे पुराने प्राकृतिक स्रोतों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। इसलिए शहर के भविष्य के लिए इन पारंपरिक झरनों को बचाना बेहद जरूरी है।

 

 

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