22 C
Dehradun
Saturday, June 13, 2026


spot_img

7 हजार महाशीर मछली की उंगलिकाओं का प्रवाहन किया

श्रीनगर, (गढ़वाल), 13 जून। नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत अलकनंदा नदी की जैव-विविधता को सशक्त बनाने और नदीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के उद्देश्य से धारी देवी के निकट अलकनंदा नदी में 7 हजार महाशीर मछली की उंगलिकाओं (फिंगरलिंग्स) का प्रवाहन किया गया। इस महत्वपूर्ण पहल को केंद्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीआईएफआरआई) बैरकपुर, कोलकाता, जंतु विज्ञान विभाग, गढ़वाल विवि तथा मत्स्य विभाग टिहरी गढ़वाल के संयुक्त सहयोग से अंजाम दिया गया। इस दौरान नदी संरक्षण, जलीय जीवों के संवर्धन और जैव-विविधता संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया गया। गढ़वाल विवि के फिश हैचरी के समन्वयक प्रो. दीपक सिंह भंडारी ने कहा कि महाशीर उत्तराखंड की राज्य मछली है और हिमालयी नदियों की पारिस्थितिकी में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। बताया कि विभिन्न कारणों से प्रदेश की नदियों में महाशीर की संख्या लगातार घट रही है। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ द्वारा भी इसे संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है, इसलिए इसका संरक्षण समय की बड़ी आवश्यकता है। बताया कि जन्तु विज्ञान विभाग, चैरास परिसर स्थित फिश हैचरी का विकास अलकनंदा हाइड्रोपावर कंपनी के सहयोग से किया गया था। इसी हैचरी तथा टिहरी गढ़वाल स्थित मत्स्य विभाग की हैचरी में विकसित महाशीर प्रजाति की 7 हजार उंगलिकाओं को अलकनंदा नदी में प्रवाहित किया गया। दोनों हैचरियों को नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत सीआईएफआरआई, बैरकपुर द्वारा आंशिक वित्तीय सहायता भी प्रदान की जा रही है। बताया कि महासीर मछली प्राचीन काल से ही खाने में एक प्रमुख प्रोटीन एवं ओमेगा फैटी एसिड का स्रोत मानी जाती रही है। यह मछली एक खेल मछली (गेम फिश) के रूप में भी प्रसिद्ध है जो पर्यटकों व सैलानियों को आकर्षित करती रही है। यह मछली स्वाद में भी इस क्षेत्र में पायी जाने वाली अन्य मछलियों से उत्तम मानी जाती है एवं बाजार मूल्य भी क्षेत्र में मिलने वाली प्रमुख मछली असेला (साइजोथाॅरेक्स प्रजाति), जिसे स्नो ट्राउट भी कहा जाता है से अधिक होता है। जहाँ स्नो ट्राउट की आयु अधिकतम 4-5 वर्ष होती है वहां गोल्डन महाशीर (टाॅर प्यूटिटोरा) की आयु  20 से 25 वर्ष तक होती है। स्नो ट्राउट का अधिकतम 3 किलोग्राम (सामान्यतः 1.5 – 2 किग्रा) होता है लेकिन गोल्डन महाशीर का अधिकतम वजन 40 से 50 किग्रा तक पहुँच सकता है। इस प्रकार यह मछली हर प्रकार से खाद्य सुरक्षा हेतु उत्तम मानी जाती है। बताया कि विभिन्न मानवजनित कारणों जिनमें अत्यधिक दोहन, अवैध दोहन, अवैज्ञानिक दोहन (मत्स्य आखेट हेतु विद्युत धारा प्रयोग, डाइनामाइटिंग, जलधाराओं में जहर का प्रयोग, आदि), जल प्रदूषण, वास स्थल विनास (नदी से बिल्डिंग मैटीरियल की निकासी से), विभिन्न विदेशी प्रजातियों का क्षेत्र में आगमन एवं जलविद्युत परियोजना हेतु बाँध निर्माण के कारण महासीर मछली की संख्या पर विपरीत प्रभाव पड़ता रहा है। जिस कारण इसकी संख्या लगातार घट रही है। विश्व में इस मछली की घटती आवादी के कारण आईयूसीएन ने इसे एक संकटाग्रस्त प्रताति घोषित किया है। इस स्थानीय प्रजाति को उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश एवं अरुणाचल प्रदेश द्वारा राज्य मछली का दर्जा दिया गया है ताकि इसका संरक्षण किया जा सके। कार्यक्रम में नमामि गंगे परियोजना से जुड़े प्रोजेक्ट वैज्ञानिक डॉ. उपेंद्र सिंह, डॉ. जितेंद्र सिंह राणा और डॉ. रणजीत सिंह ने महाशीर मछली के संरक्षण और उसके पर्यावरण उपयोगिता पर प्रकाश डाला। इस मौके पर गंगा और उसकी सहायक नदियों को स्वच्छ, निर्मल और जैव-विविधता से समृद्ध बनाए रखने का भी संकल्प लिया गया। कार्यक्रम में जंतु विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. मंजू प्रकाश गुसाईं, डीएसडब्ल्यू प्रो. ओपी. गुसाईं, मत्स्य विभाग टिहरी गढ़वाल से पुष्कर सिंह नयाल, संजय सिंह के साथ ही शोधार्थी सचिन, राहुल, अजय, आयुष, राकेश सहित आदि मौजूद थे।

 

 

 

 

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

spot_img
spot_img

Stay Connected

22,024FansLike
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe

Latest Articles

- Advertisement -spot_img