अयोध्या । अयोध्या राम मंदिर के दानपात्रों से चढ़ावा चोरी का मामला मंदिर प्रबंधन की आंतरिक कलह के कारण उजागर हुआ। अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे और दान राशि में करोड़ों रुपये के गबन का मामला सामने आया है, जिसकी जांच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर नवगठित तीन सदस्यीय विशेष जांच दल कर रही है। विपक्ष के आरोपों और देश भर में मचे बवाल के बाद, जून 2026 में इस वित्तीय अनियमितता की कड़ियां खुलने लगीं। शुरुआती अनुमानों और दावों में यह घपला 5-7 करोड़ से लेकर 200 करोड़ तक बताया जा रहा है। टीम राम जन्मभूमि परिसर में कई घंटों तक फाइलों और वित्तीय दस्तावेजों को खंगाल चुकी है। अब तक लगभग 43 लोगों से इस मामले में पूछताछ की जा चुकी है। नोटों की गिनती से जुड़े करीब 50 कर्मचारी जांच एजेंसियों के रडार पर हैं। इस कथित घोटाले में लवकुश, अवनीश, अनुकल्प, करुणेश और रमाशंकर जैसे कर्मचारियों के नाम सामने आए हैं जो दान पेटियों की रकम गिनने का काम करते थे। संदिग्ध कर्मचारियों के ठिकानों से पुलिस ने अब तक करीब 2 करोड़ कैश बरामद किए हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक कर्मचारी के घर पर गोबर के ढेर से लगभग 10 लाख रुपये बरामद किए गए थे। करीब 18,000 से 20,000 महीना कमाने वाले कर्मचारियों द्वारा अचानक 1.5 करोड़ की जमीन और 40 लाख के फ्लैट खरीदने की बात सामने आई है, जिसने जांच एजेंसियों का ध्यान खींचा।
राम मंदिर के चढ़ावे में करोड़ों के गबन के मामले की तफ्तीश स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) ने शुरू कर दी। टीम ने मंदिर परिसर में बने ट्रस्ट के कार्यालय पहुंचकर दान राशि के रिकॉर्ड कब्जे में लिए। पकड़े गए संदिग्धों से पूछताछ की और ट्रस्ट के पदाधिकारियों से बातचीत कर दान राशि की गिनती संबंधी प्रक्रिया जानी। रात तक जारी शुरुआती जांच एसआईटी को कई साक्ष्य मिले हैं। शासन ने शनिवार को ट्रस्ट के अनुरोध के बाद मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की थी। टीम में शामिल लखनऊ के मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत, आईजी रेंज लखनऊ किरन एस और विशेष सचिव वित्त नील रतन दोपहर करीब दो बजे अयोध्या पहुंचे। उन्होंने शहर के प्रमुख अधिकारियों से मुलाकात की। इसके बाद दोपहर 2:50 बजे मंदिर परिसर पहुंचे। वहां वे सीधे ट्रस्ट के दफ्तर के भीतर गए और जानकारी जुटाई। एसआईटी के साथ मंडलायुक्त, डीएम और एसएसपी भी मंदिर परिसर पहुंचे। ट्रस्ट के मुख्य पदाधिकारी भी दफ्तर में मौजूद रहे। शाम करीब पौने छह बजे ट्रस्ट के पदाधिकारी गोपाल राव मंदिर परिसर से बाहर निकलकर चले गए। करीब एक घंटे बाद मंदिर परिसर पहुंचकर ट्रस्ट के दफ्तर पहुंचे। एसआईटी ने उनसे कुछ दस्तावेज मांगे थे, जिन्हें लेने के लिए वे गए थे। एसआईटी के कई सवालों के स्पष्ट जवाब ट्रस्ट के पदाधिकारी नहीं दे सके। पूछताछ के लिए बैंक अधिकारियों व कर्मचारियों को भी बुलाया गया। एसआईटी ने पूछा कि बैंक ने किन कर्मियों को गिनती में लगा रखा था और उनकी भर्ती किस तरह की गई थी। उनका मुख्य कार्य क्या था? एसआईटी ने घटना से संबंधित कई सीसीटीवी फुटेज देखे। उन्हें साक्ष्य के तौर पर कब्जे में भी लिया। मामले के खुलासे के बारे में भी जाना। टीम ने यह भी देखा कि दान पात्र कितने हैं, वे कहां-कहां रखे हैं, गिनती से पहले उन्हें किस कमरे में ले जाया जाता है, फिर गिनती किस तरह की जाती है और उसका रिकॉर्ड कहां तथा कैसे सुरक्षित रखा जाता है। मामले में अधिकांश जानकारी ट्रस्ट के जरिये ही एसआईटी को मिलेगी, जबकि ट्रस्ट के कई पदाधिकारी व उनसे जुड़े लोग पहले से ही सवालों के घेरे में हैं। ऐसे में पूरी और सही जानकारी हासिल करना भी एसआईटी के लिए चुनौती से कम नहीं होगा। श्रीराम मंदिर ट्रस्ट के चढ़ावे में हेरफेर और गबन का मामले में ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारी भी सवालों के घेरे में हैं। कुछ पर सीधे आरोप हैं, जबकि कई की लापरवाही उजागर हुई है। यह सब उनकी नाक के नीचे हुआ, लेकिन उन्हें भनक तक नहीं लगी। अब सवाल उठ रहा है कि इन पदाधिकारियों के रहते निष्पक्ष जांच कैसे संभव होगी। ट्रस्ट के पदाधिकारी शक्तिशाली और ऊंची पहुंच वाले बताए जा रहे हैं। मामले में पांच संदिग्धों को पकड़ा गया था। उनकी निशानदेही पर करीब तीन करोड़ रुपये बरामद किए गए हैं। अंदेशा है कि करोड़ों रुपये इधर-उधर खपाए भी गए होंगे। कुछ दिन पहले गबन की रकम आठ करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही थी। अब यह सैकड़ों करोड़ रुपये होने की चर्चा हो रही है। सोशल मीडिया पर गबन की रकम दो सौ करोड़ रुपये तक होने की बात कही जा रही है। हालांकि, इन आंकड़ों के संबंध में कोई भी आधिकारिक बयान नहीं आया है। लिहाजा, इन चर्चाओं की पुष्टि संभव नहीं है। एसआईटी की जांच पूरी होने के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और पूर्व मंत्री पवन पांडेय ने सोशल मीडिया और प्रेस के माध्यम से इस मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाया है। उन्होंने सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए इसकी निष्पक्ष न्यायिक जांच की मांग की है।
अयोध्या में राम मंदिर की दान की राशि में हेरफेर कर करोड़ों रुपये के गबन के मामले में अब पांच मुख्य किरदार सामने आए हैं। ये सभी दान राशि की गिनती की ड्यूटी से जुड़े हैं। इनके खिलाफ पुख्ता सुबूत भी मिले हैं। अभी भी वह राज खोल रहे हैं। हालांकि हेरफेर के पीछे किसकी शह थी, क्या कोई बड़ा शख्स इसका साजिशकर्ता है? ये अभी भी राज बना हुआ है। सूत्रों के मुताबिक लवकुश, अवनीश, अनुकल्प, करुणे और रमाशंकर पकड़े गए हैं। अब तक हुई रिकवरी भी इन्हीं पांचों ने कराई है। चोरी कुबूल भी की है। इससे ये स्पष्ट हो गया है कि इनकी इसमें भूमिका है लेकिन इतने संवेदनशील जगह से रकम पार करते रहने और पकड़ा न जाना कई सवाल खड़े करता है। जब वह पकड़े गए हैं तब तक करोड़ों की रकम इधर से उधर की जा चुकी है। ऐसे में अंदेशा है कि क्या इसके पीछे किसी बड़े शख्स की साजिश है। वह ट्रस्ट से जुड़ा या फिर किसी अन्य विभाग आदि से है। फिलहाल इसको लेकर कोई स्पष्टता नहीं है। इतने संवेदनशील व बड़े मामले में अब तक ट्रस्ट के किसी बड़े जिम्मेदार ने कोई बयान जारी नहीं किया है। हर कोई खामोश है। इसलिए तमाम तरह की चर्चाओं व कयास का दौर जारी है। ट्रस्ट से जुड़े जुड़े दो ऐसे लोग भी हैं, जिन पर कई सवाल उठ रहे हैं। उनकी कोई भूमिका है या नहीं, ये तभी पता चल सकेगा जब कोई एजेंसी या एसआईटी मामले की विस्तृत जांच करेगी।
अयोध्या में श्रीराम मंदिर को मिले दान में गबन के तूल पकड़ने के बाद आखिरकार राज्य सरकार ने तीन सदस्यीय विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन कर दिया। एसआईटी में लखनऊ के मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत, लखनऊ जोन की पुलिस महानिरीक्षक किरन एस और विशेष वित्त सचिव नीलरतन शामिल हैं। दल सात दिन में प्रारंभिक जांच रिपोर्ट सरकार को सौंपेगा और 15 दिन में अंतिम रिपोर्ट देगा।




