देहरादून। मोहंड में स्थित सिद्धपीठ मां डाट काली मंदिर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि मां डाट काली मंदिर में शीश झुकाने से भक्तों की मनोकामना पूर्ण होती है। मां डाट काली उत्तराखंड के साथ ही पश्चिम उत्तर प्रदेश की ईष्ट देवी हैं। नवरात्र में देशभर से लाखों की संख्या में भक्त यहां पहुंचकर मां के दर्शन करते हैं। दून से सात किमी दूर सहारनपुर रोड पर स्थित मां डाट काली मंदिर की स्थापना 219 साल पहले शिवालिक की पहाड़ियों में हुई थी। मंदिर अपने आप में विशेष मान्यता संजोय हुए है। शनिवार को मां डाट काली को लाल फूल, नारियल और लाल चुनरी चढ़ाने का विशेष महत्व है। कोई भी नया वाहन लेने पर मंदिर में आकर दर्शन कर वाहन पर लाल चुनरी बांधते है। वहीं, उत्तराखंड के साथ ही देशभर से भी भक्त शुभ कार्य करने से पहले मां के दर्शन करते हैं। मंदिर के महंत रमन प्रसाद गोस्वाामी बताते हैं कि 1804 से पहले मंदिर आशारोड़ी के समीप एक जंगल में हुआ करता था। तब अग्रेंजों के समय सहारनपुर रोड पर टनल का निर्माण किया जा रहा था, लेकिन संस्था इसके निर्माण के लिए जितना खोदती थी उतना ही मलबा वहां दोबारा भर जाता था। तब मां घाठेवाली ने महंत के पूर्वजों के सपने में आकर मंदिर को टनल के पास स्थापित करने की बात कही थी। इसके बाद मंदिर को 1804 में वहां से हटाकर टनल के पास स्थापित किया गया था। मां डाट काली का नाम पहले घाठेवाली देवी हुआ करता था। महंत रमन गोस्वामी ने बताया कि मंदिर की स्थापना के बाद ही मां घाठेवाली का नाम डाटकाली पडा था। दरअसल, गांवो में सुरंग को डाट कहा जाता है। उस समय मंदिर की स्थापना भी सुरंग के पास हुई थी। इसलिए मां का नाम डाट काली पड़ गया। मंदिर में करीब 101 साल से लगातार अखंड ज्योति जल रही है। मंदिर में मां डाट काली के साथ ही हनुमान, गणेश सहित अन्य भगवानों की प्रतिमा भी स्थापित हैं। भक्त मां के दर्शन के बाद भगवान के दर्शन करते हैं। मां डाट काली के दर्शन के बाद उनकी बहन मां भद्रकाली के दर्शन किए जाते हैं। उनके दर्शन के बाद ही भक्तों की यात्रा पूर्ण मानी जाती है। मां भद्रकाली का मंदिर भी मां डाट काली मंदिर के पास स्थित टनल से सौ मीटर आगे ही स्थापित है।
उत्तराखंड के देहरादून में स्थित माँ डाट काली मनोकामना सिद्ध पीठ एक अत्यंत जागृत और प्रसिद्ध शक्तिपीठ है, जहाँ माता सती के अंश की पूजा होती है। 1804 में स्थापित यह मंदिर अपनी मनोकामना पूर्ण करने वाली शक्ति के लिए प्रसिद्ध है, और यहाँ 1921 (या कुछ मान्यताओं के अनुसार स्थापना काल) से अखंड ज्योति जल रही है। यह देहरादून-सहारनपुर राजमार्ग (मोहंड) के पास, दून घाटी में स्थित है। मान्यता के अनुसार, 1804 में सुरंग (डाट) के निर्माण के दौरान इंजीनियर के सपने में माँ काली के दर्शन के बाद इस स्थान पर मंदिर स्थापित किया गया। कहा जाता है कि यहाँ सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है, इसीलिए इसे ‘मनोकामना सिद्ध पीठ’ कहा जाता है। मंदिर में वर्षों से अखंड ज्योति और हवन कुंड लगातार जल रहे हैं, जो श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र हैं। नवरात्रि के दौरान यहाँ भारी भीड़ होती है और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। यह मंदिर सुबह से देर रात तक दर्शन के लिए खुला रहता है। मां डाट काली मनोकामना सिद्धपीठ मंदिर, एक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ है। यह मंदिर अपनी प्राचीनता, मनोकामना पूर्ण करने की शक्ति और विशेष प्रसाद के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर देवी काली को समर्पित है, मुख्य गर्भगृह में देवी माँ की काले पत्थर की प्रतिमा स्थापित है। पहाड़ों से घिरा होने के कारण यहाँ शांत वातावरण, हरे-भरे पेड़-पौधों और सुंदर प्रकृति देखने को मिलती है। माँ डाट काली मंदिर के प्रमुख महंत रमन प्रसाद गोस्वामी के अनुसार नया वाहन खरीदने के बाद भक्त यहाँ पूजा के लिए जरूर आते हैं। साथ ही साथ जब भी कोई भक्त नया काम शुरू करता है तो इस मंदिर में पूजा अर्चना करवाने जरूर आता है।आषाढ़ मास में मंदिर का वार्षिक उत्सव मनाया जाता है। नवरात्रि के दौरान मंदिर में त्योहार जैसा माहौल दिखाई पड़ता है साथ ही साथ मेले की धूम-धाम होती है।
डाट काली माता मंदिर की, जो राजधानी देहरादून के मुख्य शहर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर उत्तराखंड-उत्तर प्रदेश के बॉर्डर पर स्थापित है। इस मंदिर की बहुत मान्यता है। इसलिए प्रतिदिन यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश से भी लोग यहां आते हैं। नवरात्रों के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। मां डाट काली मंदिर का निर्माण ब्रिटिश काल में किया गया था। साल 1804 में मंदिर के निर्माण के दौरान यहां अखंड ज्योति और हवन कुंड जलाई गई थी और तब से आज तक यह जल रही है। उन्होंने कहा कि मां डाट काली मंदिर मुख्य सिद्धपीठ में से एक है। माना जाता है कि माता सती के शरीर के एक खंड गिरा था। महंत रमन प्रसाद गोस्वामी ने बताया कि मन्दिर का प्राचीन नाम मां घाटे वाली देवी था, लेकिन जब साल 1804 में मंदिर के पास मौजूद सुरंग बनी तो उसके बाद इस मंदिर का नाम डाट काली मंदिर पड़ गया। इस सिद्धपीठ की मान्यता है कि कोई भी व्यक्ति जो सच्चे मन से मनोकामना लेकर यहां पहुंचता है तो, उसकी सभी मनोकामना जरूर पूरी होती है। मां डाट काली के स्थापना के बाद सुरंग बनाने का काम शुरू हुआ था, जो जल्द ही बनकर तैयार हो गई। हालांकि, साल 1804 से 1936 तक ये सुरंग कच्ची ही रही, लेकिन 1936 के बाद फिर इस सुरंग को पक्का बना दिया गया था। साथ ही उन्होंने कहा कि मंगलवार, शनिवार और रविवार को इस मंदिर में श्रद्धालुओं की ज्यादा भीड़ देखने को मिलती है। डाट काली माता की बड़ी मान्यता है, यही वजह है कि उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की बोर्डर पर स्थित होने के साथ ही अन्य राज्यों से भी लोग यहां दर्शन करने पहुंचते हैं।




