देहरादून 13 फरवरी। महाशिवरात्रि का महापर्व एक बार फिर हमारे आस्था के द्वार पर दस्तक देनेको है। इस दिन फिर से मंदिरों में जगमग-जगमग सहस्त्रों ज्योतियाँ जलेंगी।अनहद घंटों की ध्वनि गूँजेगी। शिवलिंगों पर जल अर्पित होगा। वातावरण शिवमयहोने लगेगा। किन्तु शिव-भक्तों! भोलेनाथ का यह महापर्व हमें केवल बाहरीज्योतियाँ दिखाने, बाहरी घंटियाँ सुनाने या केवल बाहरी जलाभिषेक अर्पितकरने के लिए नहीं आता; बल्कि हमें देवाधिदेव शंकर की शाश्वतज्योति, अनहद नाद और भीतरी अमृत के अनुभव से जोड़ने आता है। बाहरी मंदिर कीपूजा ही नहीं, अंतर्जगत के अलौकिक मंदिर का साधक बनाने भी आता है। शिव कीमहिमा ‘मनाने’ ही नहीं; बल्कि शिवत्व को ‘जानने’ और उसमें स्थिततत्त्वज्ञान का बोध कराने भी आता है।
शिवपुराण में अनेकानेक स्थानों पर ‘ध्यान योग’ की महिमा गाई गई है। पुराणकी वायवीय संहिता में वर्णित है- ‘पंच यज्ञों में ध्यान और ज्ञान-यज्ञ हीमुख्य है। जिनको ध्यान अथवा ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो गया है, वे काल केचक्रवातों में नहीं उलझते। वे भव-सिंधु से उत्तीर्ण हो जाते हैं।’ यहाँतत्त्वज्ञान के अंतर्गत प्रकाश की चर्चा करेंगे।
शिवलिंग- प्रकाश स्तम्भ का द्योतक:भगवान शिव के प्रकाश स्वरूप का ध्यान कहाँ हो? कैसे हो? इसके विषय में भी शिवपुराण में उल्लेखित हैकि परब्रह्म परमात्मा सबके ह्रदय में प्रकाशित है। ह्रदय स्थल के मध्य ‘ध्यान’ द्वारा उसकी आराधना की जाती है।
यदि शिव जी की बात की जाए तो भगवान शिव तत्त्वतः निराकार ब्रह्म हैं। अबज़रा ‘लिंग’ शब्द पर भी विचार करते हैं। ‘लिंग’ का शाब्दिक अर्थ होता है-प्रतीक! तो इस प्रकार ‘शिवलिंग’ (जो शिव और लिंग के योग से बना है) का अर्थहुआ- निराकार ब्रह्म का प्रतीकात्मक स्वरूप। माने शिव के अव्यव, अक्षर वदेह से रहित रूप का प्रतीकात्मक चिन्ह शिवलिंग है। अब चूँकि शिव के इनलिंगों को ‘ज्योतिर्लिंग’ कहकर भी महिमामंडित किया गया। इसीलिए शिवलिंगस्थूल रूप में मात्र एक पिण्डी प्रतीत होता है। किंतु यह ब्रह्म के प्रकाशस्वरूप का द्योतक है।
दरअसल, पीठिका पृथ्वी का प्रतीक है- ‘पृथ्वी तस्य पीठिका’ (स्कन्द पुराण)। उस पररखा पिण्ड विराट ज्योति स्तंभ का द्योतक है। इस पीठिका और पिण्ड के संबंधको हम एक पवित्र उदाहरण से समझ सकते हैं। मिट्टी का दीपक याने पीठिका औरदीपक में प्रज्वलित उर्ध्वगामी ज्योति याने प्रकाश स्तम्भ रूपी परम लिंग!सार रूप में हम कह सकते हैं, शिव के तत्त्व रूप- प्रकाश का प्रतीकात्मकचिन्ह है- शिवलिंग अथवा ज्योतिर्लिंग!
यह ज्योतिर्लिंग कहीं बाहर नहीं हैं। इस काया रूपी मंदिर के भीतर है। जोइस आंतरिक लिंग देव की पूजा करता है, उसके जन्म-जन्म के पाप कट जाते है। परइस परम ज्योति को प्राप्त कैसे किया जाए। इसके लिए एक और प्रश्न आता है।क्या केवल भगवान शिव ही त्रिनेत्रधारी हैं? नहीं! उनके स्वरूप का यह पहलूहमको गूढ़ संकेत देता है। वह यह कि हम सब भी तीन नेत्रों वाले हैं। हम सबकेआज्ञा चक्र पर एक तीसरा नेत्र स्थित है। पर यह नेत्र जन्म से बंद रहता है।इसलिए भगवान शिव का जागृत तीसरा नेत्र प्रेरित करता है कि हम भी पूर्ण गुरुकी शरण प्राप्त कर अपना यह शिव-नेत्र जागृत कराएँ। जैसे ही हमारा यह नेत्रखुलेगा, हम अपने भीतर समाई ब्रह्म-सत्ता जो कि प्रकाश स्वरूप में विद्यमानहै का साक्षात्कार करेंगे।
भगवान शिव के बाहरी पूजन से कई गुणा महिमाशाली है- अंतर्जगत मेंज्योतिर्लिंग रूप में उनका दर्शन कर साधना करना। इसलिए शिव को तत्त्व रूपमें जानकर वास्तविक शिवरात्रि मनाएँ।सिर्फ बहिर्मुखी रहकर बाहरी अभिव्यक्ति में ही न अटकेरहें। ईश्वर को तत्त्वज्ञान से जानकर सही मायने में महाशिवरात्रि का पर्वमनाएँ। बाहरी संकेत हमें वास्तविक लक्ष्य की ओर अग्रसर करने के लिए है। तभीकाल से छुटकारा है; नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय – और कोई अन्य मार्ग है हीनहीं!
दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से सभी पाठकों को महाशिवरात्रि पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।




