देहरादून। “देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने वाले क्रांतिकारियों में रासबिहारी बोस के महत्वपूर्ण योगदान को सदैव याद किया जायेगा । उन्होंने 1911 से 1945 तक भारत की आज़ादी की लड़ाई के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। बीसवीं सदी के आरम्भिक दशकों में तमाम क्रान्तिकारी आन्दोलन के वे सूत्रधार रहे। गदर रिवोल्यूशन, अलीपुर बम काण्ड, हार्डिंग बम काण्ड से लेकर युगान्तर क्रान्तिकारी संगठन के विस्तार में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका स्मरणीय है। रासबिहारी बोस का जन्म 25 मई 1886 को बंगाल में बर्धमान जिले के सुबालदह गांव में हुआ उनके पिता का नाम विनोदबिहारी बोस था, नौकरी के सिलसिले में चन्दननगर रहते थे जहाँ से रासबिहारी बोस की प्रारम्भिक शिक्षा पूरी हुयी। उनकी माँ का देहान्त के कारण उनका पालन-पोषण उनकी मामी ने किया। चन्दननगर में डुप्लेक्स कॉलेज में अध्ययन के पश्चात उन्होंने चिकित्सा शास्त्र तथा इंजीनियरिंग की पढ़ाई फ़्रांस और जर्मनी से की। बचपन से ही देश की आजादी का उनका ख्याब था जिसका श्रेय चंदननगर के शिक्षक ‘चारू चाँद’ को जाता था। 1908 में अलीपुर बम मामले में नाम आने के बाद रासबिहारी बोस शिमला पहुँच कर एक छापेखाने में नौकरी करने लगे। उसके बाद देहरादून के फारेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट (एफ आर आई) में कुछ समय तक रसायन विभाग के संशोधन सहायक के पद पर कार्य किया। सही मायनों में फ्रेंच आधिपत्य वाले चन्दन नगर में रहकर बम बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके थे । रास बिहारी बोस इस शोध संस्थान में नौकरी क्रूड बम निर्माण के लिए आवश्यक कैमिकलों तक पहुंचने के लिऐ कर रहे थे। उनकी मुलाकात क्रान्तिकारी जतिन मुखर्जी के अगुवाई वाले युगान्तर के अमरेन्द्र चटर्जी से परिचय हुआ और वह बंगाल के क्रांतिकारियों के साथ जुड़ गए। बाद में वह अरबिंद घोष के राजनीतिक शिष्य बन गये तथा जतीन्द्रनाथ बनर्जी उर्फ निरालम्ब स्वामी के सम्पर्क में आने पर संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश), और पंजाब के प्रमुख आर्य समाजी क्रान्तिकारियों के निकट आये और इस प्रकार शीघ्र ही वे कई राज्यों के क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में आ गए ।भारतीय क्रान्तिकारी इतिहास में अंग्रेज कमाण्डर को गोली मारना तथा ट्रेन में डकैती तथा बम बिस्फोट अनेक घटनाओं का क्रम है लेकिन सबसे दुस्साहस भरा कदम ब्रिटिश वायसराय पर बम फेंकने की योजना भी रासबिहारी बोस ने बनाई थी। इतिहास में इस घटना को ‘दिल्ली षड़यन्त्र’ के नाम से जाना जाता है। बंगाल में क्रान्तिकारियों के बढ़ते दबाव के परिणामस्वरूप मजबूरन अंग्रेजों को भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली में स्थानांतरित करनी पड़ी। रास बिहारी बोस ने अंग्रेजों के मन में भय उत्पन्न करने के लिए तत्कालीन वायसराय हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना भी चन्दननगर में बनाई थी। योजना को क्रियान्वित करने के लिए 21 सितम्बर 1912 को अमरेन्द्र चटर्जी के एक शिष्य बसंत कुमार विश्वास दिल्ली के क्रांतिकारी अमीरचन्द के घर आ गये व दूसरे दिन 22 सितम्बर को रास बिहारी बोस भी दिल्ली आ गये। 23 दिसम्बर को शाही शोभायात्रा निकाली गयी जिसमें एक बड़े हाथी पर वायसराय हार्डिंग्स पत्नी के साथ था । रास बिहारी को ये अन्दाज़ा नही था कि हार्डिंग हाथी पर बैठकर आएगा इसलिये आनन फानन बंगाल के युवा क्रान्तिकारी बसंतकुमार विश्वास को जिम्मेदारियां सौंपी। शोभायात्रा चान्दनी चौक के बीच स्थित पंजाब नेशनल बैंक के सामने पहुंची ही थी कि एकाएक भंयकर धमाका हुआ ,इस बम विस्फोट में वायसराय को हल्की चोटें आई ,लेकिन हाथी का छत्रधारी महावीर सिंह मारा गया।
सरकार ने बम विस्फोट के अपराधियों को पकड़वाने वालों को 75 हजार रूपये पुरस्कार की घोषणा की जोकि काफी बड़ी रकम थी। रासबिहारी बोस रातों-रात रेलगाडी से देहरादून पहुंचे तथा आफिस में अपने कार्य पर जुट गये । उन्होंने देहरादून के नागरिकों की एक सभा में वायसराय पर हुए हमले की निन्दा भी की ताकि षडयन्त्र और बमकाण्ड में शामिल होने का सन्देह न हो । हालाँकि इस बमकाण्ड में शामिल अन्य सभी क्रान्तिकारी पकड़ गये ।1913 में बंगाल में बाढ़ राहत कार्य के दौरान रासबिहारी बोस जतिन मुखर्जी के सम्पर्क में आए उन्होंने रासबिहारी मैं नया जोश भरने का काम किया और वे दोगुने उत्साह से क्रान्तिकारी गतिविधियों में लग गये।
भारत की स्वतन्त्रता के लिये उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका में स्थापित गदर पार्टी के नेताओं के साथ मिलकर ग़दर की योजना बनायी। युगान्तर के कई नेताओं ने सोचा कि यूरोप में युद्ध होने के कारण चूँकि अभी अधिकतर सैनिक देश से बाहर गए हुये हैं, अत: शेष बचे सैनिकों को आसानी से हराया जा सकता है। ‘पिंगले’ को गदर पार्टी ने रास बिहारी बोस की सहायता से पंजाब में क्रान्तिकारियों को संगठित करने के लिए भेजा था। पिंगले से मिलने के बाद बोस के साथी ‘सान्याल’ पंजाब गये और उनके प्रयासों से 31 दिसम्बर 1914 को अमृतसर की ‘पीरवाली धर्मशाला’ में क्रान्तिकारियों की गुप्त-बैठक हुई ,रास बिहारी बोस भी जनवरी 1915 में पंजाब आये। क्रान्तिकारी करतार सिंह सराभा गज़ब के उत्साही और जोशीले थे जिन्होंने रास बिहारी बोस के साथ मिल कर सम्पूर्ण भारत में पुनः एक बार गदर करने की योजना बनाई। 21 फरवरी 1915 को बंगाल से लेकर पंजाब तक चलने वाली क्रन्तिकारी गतिविधियों कै सूत्रधार रासबिहारी ने देश के सभी क्रान्तिकारियो में जोश भर दिया। संगठन का काम बढा़ किन्तु पंजाब पुलिस का जासूस सैनिक कृपाल सिंह क्रांतिकारियों की पार्टी में शामिल हो चुका जिसने क्रान्तिकारी गतिविधियों की सूचना लेकर अपना जमीर बेच दिया और समस्त तैयारी की सूचना अंग्रेजों को दे दी परिणामस्वरूप गदर की योजना विफल हो गई तथा रास बिहारी बोस ने लाहौर छोड़ दिया उन्होंने इतना अवश्य कहा कि सन् 1857 की सशस्त्र क्रान्ति के बाद ब्रिटिश शासन की चुले हिलाने के लिऐ व्यापक और विशाल क्रान्तिकारी संगठन द्वारा केवल योजना नहीं बनाई थी बल्कि करके भी दिखाई ।उनकी अनेकों सरकार विरोधी गतिविधियों कै कारण ब्रिटिश खुफिया पुलिस ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की लेकिन वै हत्थे नहीं चढ़े और लाहौर से बनारस और फिर चन्दन नगर आ कर रहने लगे। रास बिहारी बोस ने पराधीनता का इतिहास पढ़ा और तय किया कि बिना अंतर्राष्ट्रीय मदद के कोई भी गुलाम देश स्वतन्त्रत नहीं हो सका । वे भी विदेशी सहायता से भारत को मुक्त कराने के बारे में सोचने लगे। गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर जापान कार्यक्रम था , रास बिहारी बोस ने उनकी व्यवस्था कै लिये भारत से बाहर जाने का स्वर्णिम अवसर चुना तथा
गुरूदेव के पहुँचने के पहले जून 1915 को जापान पहुँच गये तत्पश्चात वे वहाँ अपने जापानी क्रान्तिकारी मित्रों के साथ मिलकर अपने देश की स्वन्तत्रता के लिए प्रयास करते रहे। इसी दौरान उनकी मुलाक़ात चीन के क्रान्तिकारी नेता ‘सनयात सेन’ सें भी हुई। उन्होंने जापान में अंग्रेजी के अध्यापन के साथ लेखक व पत्रकार के रूप में भी काम प्रारम्भ कर दिया और ‘न्यू एशिया’ नाम से एक समाचारपत्र भी प्रकाशित किया तथा यहीं तक सीमित नहीं रहे बल्कि उन्होंने जापानी भाषा भी सीखी और 16 पुस्तकें लिखीं जिनमें 15 आज भी उपलब्ध हैं। उन्होंने ‘रामायण’ का जापानी भाषा में अनुवाद भी किया। उनको जापानी भाषा, संस्कृति तथा व्यवहार का पूर्ण ज्ञान था। ब्रिटिश सरकार अब भी उनके पीछे लगी हुई थी और वह जापान सरकार से उनके प्रत्यर्पण की मांग कर रही थी, इसलिए वह लगभग एक साल तक अपनी पहचान और आवास बदलते रहे। जापान सरकार ने इस माँग को मान भी लिया था, किंतु जापान की अत्यन्त शक्तिशाली राष्ट्रवादी संस्था ब्लेड ड्रैगन के अध्यक्ष श्री टोयामा ने श्री बोस को अपने यहाँ आश्रय दिया। इस दौरान उन्हें 17 ठिकाने बदलने पड़े। लम्बा समय ‘नकामुराया बेकरी’ के तहखाने में गुज़ारा। तहखाने में रह रहे बोस का खाना ‘पैन एशियाई समर्थक सोमा आइजो और सोमा कोत्सुको’ की पुत्री ‘तोशिका’ पहुंचाया करती थी फलतः दोनों में प्यार हो गया और उन्होंने 1916 में तोशिका से विवाह कर लिया। और उनपे लगे अभियोग वाले कागज एक ब्रिटिशशिप में जल जाने से जापान सरकार ने डिपोर्टेशन का ऑर्डर वापस ले लिया। उसके बाद 1923 में बोस जापान के नागरिक बन गए। बेकरी में निवास के दौरान उन्होंने एक दिन वहाँ कार्यरत लोगों को भारतीय खाना बनाकर खिलाने की सोची। उन्होंने एक जापानी खाने को भारतीय स्टाइल में बनाया जिसे लोगों ने बहुत पसन्द किया और उसे ‘इण्डियन करी’ नाम दिया गया , आज इतनी मशहूर है कि प्रत्येक जापानी रेस्तरां में मिल जाती है।जापानी अधिकारियों को भारतीय राष्ट्रवादियों के पक्ष में खड़ा करने और देश की आजादी के आन्दोलन को उनका सक्रिय समर्थन दिलाने में भी रासबिहारी बोस की भूमिका अहम रही। इसके लिये उन्होंने टोक्यो में ‘इंण्डिया क्लब’ बनाया। भारत में हो रही हर गतिविधि पर उनकी पैनी नजर रही। इस दौरान कोंग्रेस के शीर्ष नेतृत्व तथा स्वतंत्रता संग्राम में गांधीजी छाये हुए थे। इसलिये रास बिहारी ने गांधीजी का पेपर यंग इंडिया जापान मंगवाना शुरू किया। लेकिन गांधीजी के अहिंसक विचार रासबिहारी के गले नही उत्तर रहे थे। ऐसे में उन्हें सुभाष चन्द्र बोस में वो आशा की किरण नज़र आई। 1938 में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने पर उन्हें लिखा रासबिहारी जी का पत्र इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है। उसकी चन्द लाइने यहाँ पेश कर रहा हूँ- “मेरे प्रिय सुभाष बाबू, भारत के समाचार पत्र पाकर मुझे यह सुखद समाचार मिला है कि आगामी कांग्रेस सत्र के लिए आप अध्यक्ष चुने गये है । मैं हार्दिक शुभकामनायें भेजता हूँ।अंग्रेजों के भारत पर कब्जा करने में कुछ हद तक बंगाली भी जिम्मेदार थे । अतः मेरे विचार से बंगालियों का यह मूल कर्तव्य बनता है कि वे भारत को आजादी दिलाने में अधिक बलिदान करें। देश को सही दिशा में ले जाने के लिए आज कांग्रेस को क्रांतिकारी मानसिकता से काम लेना होगा। इस समय यह एक विकासशील संस्था है – इसे विशुद्ध क्रांतिकारी संस्था बनाना होगा । जब पूरा शरीर दूषित हो तो अंगों पर दवाई लगाने से कोई लाभ नहीं होता। हमें हिंसा अथवा अहिंसा – हर संभव तरीके से अपना लक्ष्य प्राप्त करना चाहिये । अहिंसक वातावरण भारतीय पुरूषों को स्त्रियोचित बना रहा है। शक्ति आज की वास्तविक आवश्यकता है । डॉ. मुंजे ने अपना मिलेटरी स्कूल स्थापित करके कांग्रेस की अपेक्षा अधिक कार्य किया है। भारतीयों को पहले सैनिक बनाया जाना चाहिये। रासबिहारी बोस जापान के अंदरूनी मामलो की कितनी जानकारी रखते थे तथा किस प्रकार प्रत्येक उस भारतीय से सजगता के साथ जुड़ाव रखते थे जो स्वतंत्रता आंदोलन अपना सर्वस्व न्योछावर कर रहा था। इसी प्रेरणा के फलस्वरूप सुभाष बोस जर्मनी जाकर सिंगापुर पहुँचे और आज़ाद हिन्द फौज एवं सरकार का गठन किया । रासबिहारी ने 28 मार्च 1942 को टोक्यो में एक सम्मेलन बुलाया जिसमें इण्डियन इण्डिपैन्डैन्स लीग की स्थापना का निर्णय किया गया, इस सम्मेलन में उन्होंने भारत की आजादी के लिए एक सेना बनाने का प्रस्ताव भी पेश किया। 22 जून 1942 को रासबिहारी बोस ने बैंकाक में लीग का दूसरा सम्मेलन बुलाया, जिसमें सुभाष चंद्र बोस को लीग में शामिल होने और उसका अध्यक्ष बनने के लिए आमन्त्रित करने का प्रस्ताव पारित किया गया। द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान ने मलय और बर्मा के मोर्चे पर लगभग 60000 भारतीय युद्धबन्दियों को पकड़ा जिन्हें युद्धबन्दियों को इण्डियन इण्डिपेण्डेंस लीग में शामिल होने और इंडियन नेशनल आर्मी (आई०एन०ए०) का सैनिक बनने के लिये प्रोत्साहित किया गया। कैप्टन मोहनसिंह इसके पहले कमाण्डर थे तत्पश्चात 1942 में आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन रासबिहारी बोस की इंडियन नेशनल लीग की सैन्य शाखा के रूप में हुआ। रासबिहारी बोस शक्ति और यश के शिखर को छूने ही वाले थे कि जापानी सैन्य कमान ने उन्हें और जनरल मोहन सिंह को आईएनए के नेतृत्व से हटा दिया लेकिन आईएनए का संगठनात्मक ढांचा बना रहा। बाद में इसी ढांचे पर सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के नाम से आईएनएस का पुनर्गठन किया ,स्थिति हाथ से जाती देख रासबिहारी बोस ने जापान सरकार से अनुरोध किया कि नेताजी को जल्द-से-जल्द जर्मनी से जापान बुलाना होगा क्योंकि आई.एन.ए. को नेतृत्व वही दे सकते हैं, कोई और नहीं। जापानी ग्राउण्ड सेल्फ-डिफेन्स के लेफ्टिनेण्ट जनरल ने रासबिहारी बोस से पूछा क्या आपसे ग्यारह वर्ष छोटे नेताजी के अधीन रहकर काम करने के लिए तैयार हैं? रासबिहारी बोस का जवाब था कि देश की आजादी के लिए वे सहर्ष नेताजी के अधीन रहकर काम करेंगे ,यही सवाल दूतावास में जापानी मिलिटरी अटैश के ‘श्री हिगुति’ ने नेताजी से पूछा तो नेताजी का जवाब था कि व्यक्तिगत रुप से तो वे रासबिहारी बोस को नहीं जानते; मगर चूँकि वे टोक्यो में रहकर भारत की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, इसलिए वे खुशी-खुशी उनके सिपाही बनने के लिए तैयार हैं। ये एक नज़ीर है जिसमें आजादी के संघर्ष के दो महानायक एक-दूसरे के अधीन रहकर देश की आजादी के लिए काम करने को तैयार थे। जबकि वै नितांत अंजान थे। 4 जुलाई 1943 को सिंगापुर के कैथे भवन में रास बिहारी बोस ने आजाद हिन्द फौज की कमान सुभाष चन्द्र बोस को सौंपी। अतः सुभाष चन्द्र बोस के लिये एक सैनिक यूनिट और पॉलिटिकल यूनिट की आधारशिला रासबिहारी बोस तथा मोहनसिंह ने रख दी थी। सुभाष चन्द्र बोस ने सर्वोच्च सलाहकार के पद पर रास बिहारी बोस को आग्रहपूर्वक रखा तथा अब तक आजीवन संघर्ष व जीवन सहचरी तोशिको की 1935 में तथा पुत्र ‘माशेहीद’ के 1943 में निधन से रास बिहारी बोस का मन व शरीर दोनो टूट चुके थे, नवम्बर 1944 में सुभाष चन्द्र बोस जब रास बिहारी बोस के पास आये तब तक उनकी हालत बहुत खराब चुकी थी। स्थिति बिगडने पर जनवरी 1945 में उन्हें सरकारी अस्पताल टोकियो में उपचार हेतु भर्ती कराया गया। इसी समय जापान के सम्राट ने उगते सूर्य के देश के दो किरणों वाले द्वितीय सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान ‘आर्डर ऑफ़ राइजिंग सन’ से रास बिहारी बोस को विभूषित किया, बो नै भारत को ब्रिटिश शासन की गुलामी से मुक्ति दिलाने कै लिये मरते दम तक तोड़ मेहनत करते हुए 21 जनवरी 1945 को इस दुनिया को अलविदा कहा। जापान ने तो इस अमर बलिदानी के जज्बे और संघर्ष को भरपूर सम्मान दिया, लेकिन खुद बोस के देश में कोई ज़िक्र तक नहीं हुआ। इस का सबूत है 2013 में जब उनकी अस्थिया 70 वर्ष बाद विसर्जन हेतु उनकी बेटी ‘तेस्तु हिगुची’ द्वारा देश में लाई, न सार्वजनिक रूप से विशेष तवज़्ज़ो मिली और न ही कोई बड़ा चेहरा उनके स्वागत और हुगली नदी में अस्थियों के विसर्जन में उनके शहर चंदननगर पहुँचा। जबकि जापान में आज भी उनको बच्चा बच्चा जनता है तथा उनके प्रति आदर भाव रखता है,ठीक उसी तरह पेशावर विद्रोह के महानायक चन्द्र सिंह गढ़वाली को महत्वपूर्ण योगदान को हमारे देश में उतना महत्व न मिलना चिन्ताजनक आज भी विश्वभर में पेशावर विद्रोह इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में दर्ज है ,जब गढ़वाल राइफल के सिपाहियों ने देश की आजादी के लिये लड़ रहे पठानों पर गोली चलाने से मनाकर साम्प्रदायिक एकता एवं देश भक्ति का अकूत उदाहरण दिया ,हालांकि उन्हें इस नाफरमानी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी, फौज से बर्खास्तगी के साथ ही कोर्ट मार्शल तत्पश्चात कठोर कारावास की सजा भुगतनी पड़ी। इतिहास में जो परिवर्तन हुए उनके लिये मानव समाज ने भारी कुर्बानी के बाद हासिल किया। कुल मिलाकर आज हमारे लिऐ आजादी की समृद्ध परम्मरा को समझने। तथा इसे संजोयै रखने की जरूरत है ।




