देहरादून, 04 जनवरी। पछवादून विकास मंच ने देश की पहली महिला अध्यापिका सावित्रीबाई फुले की जयंती पर कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में महिलाओं के उत्थान के लिए उनके द्वारा किए गए कार्यों पर प्रकाश डाला गया। शुभारंभ मंच संयोजक अतुल शर्मा ने किया। उन्होंने कहा कि तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों के विरोध का सामना करते हुए सावित्रीबाई फुले ने महिलाओं को शिक्षा के अधिकार के प्रति जागरूक किया। उन्होंने न केवल महिला शिक्षा को नई दिशा प्रदान की बल्कि समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव के लिए लगातार संघर्ष भी किया। कहा कि आज सावित्रीबाई फुले हमारे बीच में नहीं है लेकिन उनके द्वारा किए गए कार्य हमेशा याद किए जाएंगे। इस मौके पर मुकेश राज शर्मा, आमोद शर्मा, राकेश कश्यप, वीर सिंह राणा, मोहन खत्री, अजय कुमार, महेंद्र सिंह, संजीव कुमार, चंद्रशेखर, मनोज कुमार आदि उपस्थित रहे।
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ था। इनके पिता का नाम खन्दोजी नैवेसे और माता का नाम लक्ष्मीबाई था। सावित्रीबाई फुले का विवाह 1841 में महात्मा ज्योतिराव फुले से हुआ था। सावित्रीबाई फुले भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल (भारत की प्रथम महिला शिक्षिका) और पहले किसान स्कूल की संस्थापक थीं। महात्मा ज्योतिराव को महाराष्ट्र और भारत में सामाजिक सुधार आंदोलन में एक सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में माना जाता है। उनको महिलाओं और अनाथ, दीन-दुखी, गरीब लोगों को शिक्षित करने के प्रयासों के लिए जाना जाता है। ज्योतिराव, जो बाद में ज्योतिबा के नाम से जाने गए सावित्रीबाई के संरक्षक, गुरु और समर्थक थे। सावित्रीबाई ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जीया जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और महिलाओ को शिक्षित बनाना। वे एक कवियत्री भी थीं उन्हें मराठी की आदिकवियत्री के रूप में भी जाना जाता था। 10 मार्च 1897 को प्लेग के कारण सावित्रीबाई फुले का निधन हो गया। प्लेग महामारी में सावित्रीबाई प्लेग के मरीजों की सेवा करती थीं। एक प्लेग के छूत से प्रभावित बच्चे की सेवा करने के कारण इनको भी छूत लग गया। और इसी कारण से उनकी मृत्यु हुई।
वैसे तो समाज में हरेक महिला की भूमिका शिक्षक की है, वह बचपन से लेकर जीवन के हरेक मोड़ पर समाज को दिशा देती है वे दुख, कष्ट, अभाव सहते हुऐ विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी अपना कर्तव्य निभाती हैं, उन्ही में से अग्रणी हैं सावित्रीबाई 3 जनवरी 1831 में पुणे में दलित परिवार में जन्मी सावित्री बाई फुले, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन महिलाओं, शोषित-पीड़ित और वंचितों के लिए समर्पित कर दिया है, उनकी जयन्ती पर उन्हें शत् शत् नमन। उनके जीवन के कुछ यथार्थ सावित्री बाई फूले की सन् 1840 में 9 साल की उम्र में शादी हो गई थी उन्होंने अपने पति ज्योति फुले के साथ मिलकर लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोलें। पहला बालिका विद्यालय सन 1848 में महाराष्ट्र के पुणे में खोला। सावित्री बाई ने जनवरी 1853 में गर्भवती पीड़ित महिलाओं के लिए बाल हत्या प्रति-बंधक गृह की स्थापना की और सावित्रिबाई को आंदोलन की पहली नेता भी कहा जाता है। उस दौर में लड़कियों का जब घर से बाहर निकलना उनको पढ़ना-लिखना भी सही नहीं माना जाता था, उस दौरान सावित्रीबाई ने बालिकाओं के लिए स्कूल खोले। उनको विद्यालय खोलने पर बहुत ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ा ,लोग उन पर पत्थर फेंकते और गन्दगी भी फेंकते थे फिर भी अपने इरादों से पीछे नहीं हटी और अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रही। सावित्री बाई फूले एक कवियत्री भी थी उनको मराठी कवित्री के रूप में जाना जाता है, इनको आधुनिक मराठी काव्य का भी अग्रदूत माना जाता हैं। सावित्री बाई ने 19वीं सदी में अपने पति ज्योतिबा फूले के साथ मिलकर छुआछूत, सती प्रथा,बाल विवाह और विधवा विवाह जैसी कुरीतियों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी दोनों ने साथ मिलकर इनके खिलाफ आवाज उठाई और दोनों ने एक साथ काम किया। सावित्रीबाई फूले ने औरतों को ही नहीं बल्कि मर्दों को भी शिक्षित करने का कार्य किया। दुनिया में लगातार विकसित और नारीवादी सोच की ठोस बुनियाद सावित्री बाई और उनके पति ज्योतिबा ने मिलकर डाली थी।दोनों ऑक्सफोर्ड नहीं गऐ थे ,बल्कि उन्होंने यही रहकर हमारे यहाँ की कुप्रथा को पहचाना और उनका विरोध किया और उनका समाधान भी यहीं रहकर करने की कोशिश की। जातिवादी एवं साम्प्रदायिकता के कुचक्र में हमारा समाज ग्रसित है जिसका खामियाजा हम सबको बिशेषकर कमजोर वर्ग के हिस्से को झेलना पड़ रहा है, 190 वर्ष बाद भी ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के संघर्ष एवं बलिदान की समसामयिकता बनी हुई है। महिलाओं की शिक्षा के लिए उनका योगदान अद्वितीय है, जहां महिलाओं को निशाना बनाया जाता था वहां उनके खिलाफ बोलने वालों के लिए भी इन्होंने अपनी आवाज उठाई। उन्होंने आंदोलन में एक नई दिशा दी और विधवाओं के हकों की आवाज भी साथ -साथ उठाई। सावित्रीबाई को दलित समाज तथा महिलाओं को शिक्षित करने वाली देश प्रथम महिला शिक्षक के रूप में जाना जाता है उनकी इस योगदान को आगे बढा़ने में समाजसेवी बीबी फातिमा का महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करना जरूरी हो जाता है।




