देहरादून 24 अगस्त। आचार्य डॉक्टर बिपीन जोशी ने जानकारी देते हुये बताया की कुमाऊं में सातू-आठू यानि गौरामहेश पर्व मनाया जाता है। शिव-पार्वती की उपासना का यह पर्व हैं। इसकी शुरुआत मे बीरूड़ (पांच प्रकार का अनाज) भाद्र माह के पंचमी को भिगाये जाते है। बिरुड़े का अर्थ बिरुड़ पंचमी के दिन एक साफ तांबेया पितल के बर्तन में पांच या सात तरह के अनाज को मंदिर के पास भिगोकर रखा जाता है। भिगोये जाने वाले अनाज मक्का, गेहूं, गहत, ग्रूस (गुरुस), चना, मटर और कलों हैं। बर्तन के चारों और नौ या ग्यारह छोटी-छोटी आकृतियां बनाई जाती हैं। ये आकृतियां गोबर से बनती हैं। इन आकृति में दूब डोबी जाती है। यह पर्व भाद्र महीने की पंचमी से शुरू होता है और पूरे हफ्ते भर चलता है। महिलाएं इस पर्व में शिव-पार्वती के जीवन पर आधारित लोक गीतों पर खेल लगाकर शिव-पार्वती की जीवन लीला का प्रदर्शन करते है। कहते हैं कि जब पार्वती भगवान शिव से नाराज होकर मायके आतीं हैं तो शिवजी उन्हें वापस लेने धरती पर आते हैं, घर वापसी के इसी मौके को यहां गौरा देवी के विदाई के रूप में मनाया जाता है।




