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नेवल विद्रोह के नेता कामरेड मेजर जयपाल सिंह : अनन्त आकाश

देहरादून 19 फरवरी। मेजर कामरेड जयपाल सिंह उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के जाट बिरादरी से आते थे । ब्रिटिश सेना के बागी और तेलंगाना जन-संघर्ष के प्रमुख नेताओं में एक थे। सीपीआई (एम) के सदस्य के रूप में, उन्होंने दिल्ली, हरियाणा और यूपी में पार्टी संगठन को मजबूत किया। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान पार्टी कार्यालय की रक्षा की और 1970 में गिरफ्तार भी हुए। कामरेड जयपाल सिंह का जन्म 15 जुलाई 1916 को मुजफ्फरनगर (UP) के शामली के पास कुरमाली गाँव में एक किसान परिवार में हुआ था ,वे ब्रिटिश सेना में थे लेकिन बागी बन गए। उन्होंने तेलंगाना किसान संघर्ष (1950-51) में छापामार सैनिकों को प्रशिक्षण दिया। 1957 के संसदीय चुनाव में सीपीआई उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे, जहाँ उनके समर्थन में 70,000 लोगों ने जुलूस निकाला था , 1964 में सीपीआई (एम) में शामिल हुए और पार्टी के लिए भूमिगत होकर भी कार्य किया ,1972 में दिल्ली प्रांतीय कमेटी के सचिव के रूप में काम करते हुए उन्होंने दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पार्टी का विकास किया ,उनका 25 जनवरी 1982 को निधन हुआ, उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के दमन,और अन्याय के खिलाफ सेना के जवानों को गोलबंद करने का काम किया।वे सेना के अंदर ब्रिटिश साम्राज्यवाद और गुलामी से मुक्ति के लिए सेना के अंदर स्वतंत्र भारत के लिए जज्बा भरने का काम किया।1941 में वे सेना के अफसर बन गए।वे अंग्रेजों के खिलाफ आंतरिक लड़ाई के लिए सेना के अफसरों की एक गुप्त संगठन ,जिसका नाम काउंसिल ऑफ एक्शन था। 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन के समय 3 हजार से ज्यादा हथियार क्रान्तिकारियों को भेजा,1946 में नौसेना विद्रोह की मुख्य भूमिका में वे थे,जिसका कांग्रेस द्वारा विरोध करने पर वे निराश हो गए थे। इसी दौरान ब्रिटिश हुकूमत का उन्हें गुप्त दस्तावेज मिला। जिसका कोड नाम ऑपरेशन असायलम था। जिसका मकसद राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े नेताओं की हत्या करना था। मेजर जयपाल सिंह भारी खतरा लेते हुए इसकी जानकारी कांग्रेस ,समाजवादियों और कम्युनिस्टों को दी।जिस पर कांग्रेस और सोशलिस्टों ने कोई ध्यान नहीं दिया।लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी और रिवॉल्यूशनरी काउंसिल ऑफ एक्शन ने इसे प्रकाशित कर दिया।जिसके चलते सेना से मेजर जयपाल सिंह को भागना पड़ा था।वरना कोर्ट मार्शल कर के उन्हें गोली मार दिया जाता। इस आरोप में 3 सितंबर 47 को इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन नेहरू सरकार ने उन्हें बचाने के लिए कुछ भी नहीं किया।इस तरह एक साल तक उन्हें फोर्ट विलियन जेल में रहना पड़ा।वे अपने 10 वर्षों के भूमिगत जीवन में बंगाल के किसानों के संघर्ष,तेलंगाना निजाम के खिलाफ हथिया बंद संघर्ष,पांडिचेरी में फ्रांसीसी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष,मणिपुर में आदिवासियों के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका की।1956 में भूमिगत जीवन से निकलने के बाद,1970 में उन्हें पुराने केसों में फिर से जेल में डाल दिया गया।1975 में आपातकाल में वे जेल में रहे , आज उनके पुण्यतिथि पर उन्हें क्रान्तिकारी सलाम।

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